जर्मनी में ये काम बहुत गंभीरता से हो रहा है. यूरोप और अमेरिका में ये मानने वाले बढ़ रहे हैं कि कृत्रिम प्रकाश एक तरह का प्रदूषण करता है और ये जैवविविधता के लिए खतरनाक है. जलवायु के लिए भी उचित नहीं है. फिर बिजली की कम खपत करके बिजली और पैसा दोनों की बचत होती है.
अगर हम रात में कम बिजली का इस्तेमाल करते कम कृत्रिम रोशनी की मदद लें तो वायु प्रदूषण भी कम होगा. बिजली के उपकरणों से निकलने वाली हानिकारक किरणों से जलवायु परिवर्तन को होने वाला नुकसान भी कम किया जा सकेगा. रोशनी की अधिकता से खुद भारत में हर साल 12 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ रहा है.
तोक्यो और सिंगापुर की रातें चमकदार
तोक्यों और सिंगापुर में तो रातें इतनी चमकदार और रोशनीभरी होती हैं कि लोग वास्तविक अंधेरे को महसूस करना चाहते हैं लेकिन ऐसा उन्हें मिल नहीं पाता. यूरोप और अमेरिका में भी यही स्थिति है. वहां लोगों को वाकई वास्तविक अंधेरे का कोई अनुभव ही नहीं है.
पर्यावरण के लिए भी बेहतर है रात का अंधेरा
डैश वैले की एक रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण की बेहतरी के लिए रात में अंधेरा रहना फायदेमंद तो है ही. साथ ही अगर हम रात में पर्याप्त अंधेरे में रहते या सोते हैं तो ये मानव स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होता है. रिसर्च कहती हैं कि कृत्रिम रोशनी कई तरह के रोगों को आमंत्रण दे सकती है, जिसमें आंखों में घाव, अनिद्रा, मोटापा और कई तरह के अवसाद शामिल हैं. अंधेरे में जब भी हम सोते हैं तो नींद की क्वालिटी अच्छी रहती है और इसका असर शरीर के स्वास्थ्य पर सीधे सीधे पड़ता है.
अंधेरे में भरपूर नींद लीजिए
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड वेलफेयर फिनलैंड के रिसर्च प्रोफेसर टिमो पार्टोनन ने अपनी रिसर्च में लिखा, लोग अमूमन 06 से 09 घंटे सोते हैं और अगर आप चाहते हैं कि बेहतर नींद लें तो आपको अंधेरे में सोने की जरूरत है. अच्छी नींद रक्तचाप बेहतर रखने के साथ वजन आदि बढ़ने की समस्याओं पर काबू रखती है. ब्रेन अच्छी तरह काम करता है और याददाश्त बेहतर बनी रहती है.अंधेरे में सोना कई तरीके के स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है. उनमें से एक है – डायबिटीज.
नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि सोते समय लाइट ऑन रखना डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है. अध्ययन में पाया गया है कि तेज लाइट में सोने से इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ जाता है. कई अध्ययन ये भी बताते हैं कि एक अशांत या खराब नींद अन्य चयापचय रोगों को जोड़ने के अलावा, डिप्रेशन, स्तन और प्रोस्टेट के कैंसर का कारण बन सकता है.
एक खास हार्मोन पैदा होता है अंधेरे में
जिस तरह नेचुरल लाइट में नहीं रहने से विटामिन डी की कमी होने लगी है, उसी तरह अंधेरे में नहीं रहने पर भी एक खास हार्मोन की कमी शरीर में हो जाती है. अंधेरे की कमी से होने वाली बीमारियों के पीछे मिलेटोनिन नाम का हॉर्मोन है जो कि अंधेरा होने पर ही निकलता है. जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंस के वैज्ञानिक क्रिस्टोफर क्याबा कहते हैं, “जब हमें यह हॉर्मोन नहीं मिलता या फिर जो लोग शिफ्ट में काम करने वाले होते हैं, तब बॉयोलॉजिकल क्लॉक सिस्टम बिगड़ जाता है और उसकी वजह से समस्याएं खड़ी होने लगती हैं.”
अमेरिका में साल 2020 में हुई रिसर्च बताती है, कृत्रिम प्रकाश की अधिकता में रहने वाले बच्चों और किशोरों को नींद कम आती है. वो आगे जाकर कई मानसिक बीमारियों के शिकार हो सकते हैं.
जानवरों और पौधों को भी अंधेरा पसंद
रात में कृत्रिम प्रकाश में रहने के लिए दूसरे जीवों को भी संघर्ष करना पड़ता है. उदाहरण के लिए, मूंगे प्रजनन नहीं कर पाते, प्रवासी पक्षी अपने घूमने की प्रवृत्ति को खो सकते हैं और तुरंत निकले घड़ियाल कई बार समुद्र में जाने की बजाय जमीन पर टहलने लगते हैं जिससे उनकी मौत भी हो जाती है. फिनलैंड एनवायरमेंट इंस्टीट्यूट के सीनियर रिसर्चर जेरी लितिमाकी ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में लिखा कि अंधेरा पौधों से लेकर जानवरों और मानव के लिए बहुत जरूरी है. ये एक किस्म के प्राकृतिक लय का निर्माण करता है.
चमगादड़, अंधेरे में विचरण करने वाले कई पक्षी और कीड़े भी कृत्रिम प्रकाश से परेशान रहते हैं. एक अध्ययन के मुताबिक, जर्मनी में गर्मी के मौसम में कृत्रिम प्रकाश की वजह से हर साल रात में उड़ने वाले करीब 100 अरब कीड़ों की मौत हो जाती है.
पौधों पर किस तरह पड़ता है असर
रिसर्च ये भी बताते हैं कि स्ट्रीट लाइटों के आस-पास उगने वाले पौधों में रात के वक्त कम परागण होता है. इस वजह से उनमें फल-फूल भी कम होते हैं. जबकि यही पौधे अंधेरे की वजह से ज्यादा फल देते हैं. यहां तक बड़े-बड़े वृक्षों पर भी रात में सड़कों की रोशनी का विपरीत प्रभाव पड़ता है. उनमें कलियां पहले ही निकलने लगती हैं और पत्ते बाद में झड़ते हैं.
अंधेरे में सोने से डिप्रेशन दूर होता है
अगर आप रात के समय कंप्यूटर में काम करते हैं या फिर कम बिजली में पढ़ते हैं तो इससे तनाव का स्तर बढ़ जाता है. असल में रात के समय प्राकृतिक रूप से अंधेरा हो रहा होता है जबकि हम कृत्रिम रोशनी में पढ़ने की कोशिश करते हैं. ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी अस्पताल में किए गए शोध के अनुसार, लाइट में सोने से सर्कैडियन लय बिगड़ जाती है. दूसरे शब्दों में, हमारे शरीर को पता नहीं चलता कि किस समय बिस्तर पर जाना है, शरीर की लय विकृत हो जाती है, जिससे मानसिक असंतुलन होता है, और डिप्रेशन से पीड़ित होने का आशंका बढ़ जाती है. इसलिए हमेशा अंधेरे में सोने की कोशिश करनी चाहिए.

