कपूरथला (गौरव मढ़िया) दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम कपूरथला में साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें श्री आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी तेजस्विनी भारती जी ने कहा कि गुरु और सेवक का रिश्ता दुनिया का सर्वोत्तम नाता है।

सतगुरु एक ओर जहां अपनी असीम कृपा बरसाते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने शिष्यों को कर्म का सिद्धांत भी सिखाते हैं। आइए जानें कैसे? हम देखते हैं कि दुनिया किसे खूबसूरत कहती है जब उस खूबसूरत के सामने दूसरे कुरूप दिखाई देते हैं, ज्ञानी उसे कहते हैं जो तर्क में दूसरों से आगे निकल जाता है।पर विचार करें कि कोई ऐसा भी है जो स्वयं तो सुंदर है ही बल्कि अपने संग से कुरूप को भी सुंदर बना देता है,

कोई इतना ज्ञानी है जो अज्ञानी को भी ज्ञानी बना सकता है, आज के परिवेश में ऐसे गुण किसी काल्पनिक कहानी के पात्र लगते हैं, लेकिन यह कोरी भ्रम नहीं अपितु अटल सत्य है जो गुरु के रूप में संसार में सदैव रहता है। क्योंकि गुरु की कार्यशैली निराली है। वह अनुग्रह देता है लेकिन पुरुषार्थ के आधार पर। शिष्य का छोटा सा प्रयास ही गुरु कृपा का आधार बन जाता है,

क्योंकि जिस गुरु में ईश्वर के दर्शन कराने की क्षमता होती है, वही नारायण का रूप होता है। ईश्वर के दर्शन ही मानव जीवन का लक्ष्य है। परंतु यदि दर्शन की चाह ही न हो, जिसने अपने लक्ष्य का स्वप्न भी नहीं देखा हो उसे मंजिल कैसे मिलेगी? लेकिन दर्शन की प्यास हो तो पूर्ण गुरु भी मिल जाते हैं।
इस दौरान साध्वी निधि भारती जी ने मधुर भजन संकीर्तन गाकर उपस्थित लोगों का मन मोह लिया।

